Monday, February 16, 2009

जो खो चुका है: दादासाहेब फाल्के


कल दादासाहेब फाल्के को गुज़रे ६५ साल हो गए और कोई आवाज़ भी नहीं हुई, सिनेमाई गलियारों में भी हमेशा से चली आ रही चुप्पी रही। इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। हमारे यहाँ शुरू से उन लोगों को भुलाने की परम्परा चली आ रही है जिन्हें हम वैसे महानायक का दर्जा देते हैं और बहुत आदर से देखते हैं। १९३७ में चार साल के अंतराल के बाद दादासाहेब ने अपनी आखरी फिल्म "गंगाअवतरण" बनाई और हमेशा के लिए नासिक चले गए।
१९३८ में भारतीय फिल्मों-जगत की रजत-जयन्ती मनाई गयी थी। ज़ाहिर है पहली फ़िल्म दादासाहेब की "राजा हरिश्चंद्र" को मानते हुए सन ३८ में रजत-जयंती समारोह हुआ। इस समारोह में दादासाहेब को भी निमंत्रण भेजा गया मगर जब वे वहां पहुंचे तो न तो उन्हें यथोचित सम्मान मिला और न ही किसी ने उनकी ओर ध्यान दिया। एकमात्र व्यक्ति जिसे शायद दादासाहेब की महत्ता मालूम थी, प्रभात फिल्म्स के शांतारामबाबु, उन्हें मंच तक भी ले गए और सिनेमा जगत से आग्रह किया कि नासिक में उनके रहने की व्यवस्था के लिए धन दें। अंततः शांतारामबाबु ने ही इस राशि का बड़ा हिस्सा दिया। वहीं नासिक में छ: साल बाद दादासाहेब की मृत्यु अकेलेपन और उपेक्षा में हुई। १९३८ में ही जब सिनेमा-जगत भारतीय-सिनेमा के पितामह को भुला चुका था तो एक फिल्म-पत्रिका को उनका पता मिला और पत्रिका ने उन्हें एक इंटरव्यू करने का आग्रह किया, जिसके जवाब में उन्होंने लिखा, "जिस सिनेमा-जगत को भारत में मैंने जन्म दिया, जब उसी ने मुझे भुला दिया तो आप भी भुला दें।"
आज जो सिनेमा-जगत का हाल है, उसकी नींव संभवतः उसी दौर में पड़ चुकी थी। दादासाहेब की ही तरह भारत भूषण, ललिता पवार और ओमप्रकाश आदि भी भुला दिए गए और इन सभी ने बड़ी कठिनाइयों में अपने आखरी दिन गुज़ारे। "आउट ऑफ़ साइट, आउट ऑफ़ माइंड" फिल्म-जगत में शुरू से चलता आया है। किसी फिल्म-लेखक के संस्मरण में कहीं पढ़ा था कि दादासाहेब को एक सेठनुमा फिल्म-निर्माता के स्टूडियो के बाहर बदहाल देखा गया था और वे उस फिल्म-निर्माता से बात करने की कोशिश कर रहे थे। सवाक फिल्मों की शुरुआत होने के बाद जैसी उनकी माली हालत हो चुकी थी यह सच भी हो सकता है। फिल्मों से जुड़े एक अन्य व्यक्ति ने उनके बच्चों को मुंबई की सड़कों पर भीख मांगते हुए देखने का दावा भी किया था। यह अगर सच न भी हो तो भी दादासाहेब की आर्थिक हालत कमोबेश ऐसी ही हो चुकी थी। मगर एक साल में औसतन ६ फिल्में बनाने वाले दादासाहेब को ऐसे दिन क्यों देखने पड़े?
१९९६ में भारत में सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में काफ़ी समारोह हुए और इस वर्ष को सरकारी-गैर सरकारी तौर पर भारतीय सिनेमा के शताब्दी-वर्ष के रूप में मनाया गया। इसपर विवाद भी हुए क्योंकि भारत में १८९६ में फिल्मों की शुरुआत नहीं हुई थी। उस वर्ष सिर्फ़ इतना हुआ था कि लुमिए ब्रदर्स ने १८९५ में बने अपनी पहली फ़िल्म का मुंबई में प्रदर्शन किया था। संभवतः इसपर भी विवाद हों कि भारत में ठीक-ठीक फ़िल्म की शुरुआत कब हुई थी। आज से तकरीबन १२-१५ साल पहले एक अग्रणी साहित्यिक पत्रिका में मुझे पढने को मिला था कि १८९७ में किसी व्यक्ति ने कुछ सेठों को लुभाने के लिए एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम था "द कोकोनट ट्री"। इसका उद्देश्य सिर्फ़ इतना भर था कि सेठ फ़िल्म बनाने के लिए पैसा दें। कुछेक मिनट की इस फ़िल्म में नारियल के पेड़ को बढ़ते दिखाया गया था। बाद में मुझे पता चला कि दादा साहेब फाल्के ने "राजा हरिश्चंद्र" बनने से पहले ऐसा प्रयोग किया था। उन्होंने दो मिनट की एक फ़िल्म बनाई जिसका नाम था "बर्थ ऑफ़ अ प्लांट"। इसके लिए उन्होंने एक पौधे के उगने से लेकर ४५ दिनों तक उसके विकास को दर्शाया। यहाँ भी उद्देश्य वही था अपनी पहली फ़िल्म "राजा हरिश्चंद्र" के लिए फाइनेंसर्स जुटाना। संभवतः पहली बात ग़लत हों और ऐसा प्रयोग सिर्फ़ दादासाहेब ने ही किया हों। तो भी यह विवाद का विषय हो सकता है कि भारत में बनी पहली फ़िल्म कौनसी थी। १८९९ में हरिश्चंद्र सखाराम भटवडेकर ने दो छोटी फिल्में बनाईं थीं: "द रेसलर" और "मैन एंड मंकी"। इन्हे भी पहली फिल्मों के खिताब से नवाजा जा सकता है हालाँकि ये फुल लेंथ फिल्में नहीं थीं। १९१२ में दादासाहेब तोरने फुल लेंथ फ़िल्म "पुंडलिक" बना चुके थे और उसका प्रीमियम मुंबई के कोरोनेशन थिएटर में उसी वर्ष हो चुका था। अगले साल "राजा हरिश्चंद्र" का प्रीमियम भी इसी थिएटर में हुआ। आज भारतीय फिल्मों के पितामह के रूप में दादासाहेब को देखा जाता है क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन फिल्मों को समर्पित कर दिया।


अगर इस झमेले में न पड़ा जाए कि पहली भारतीय फ़िल्म किसने बनाई तो दादासाहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जनक कहना ग़लत नहीं है। तकरीबन बीस सालों में उन्होंने ९५ फुल लेंथ फिल्में और २६ शोर्ट फिल्में बनाईं। यह उस समय की बात है जब भारत में सिनेमा ने रेंगना भी शुरू नहीं किया था। उस समय न तो यह ठीक से कोई विधा बन पाई थी और न ही इसने उद्योग की शक्ल लेनी शुरू की थी। उस दौर में सिनेमा से सामाजिक वर्जनाएं भी जुडी थीं और सिनेमा की तकनीक भी भारत में उपलब्ध नहीं थी। इन सब से पार पाते हुए दादासाहेब ने अपना फिल्मी सफर शुरू भी किया और अगले बीस सालों तक बगैर रुके फ़िल्म-व्यवसाय को एक निश्चित आकार भी देते रहे। कई कलाओं में महारत प्राप्त इस व्यक्ति ने यह फ़िल्म बनाने का सपना अचानक ही नहीं देख डाला। पाँच साल मुंबई के जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट में पढ़ाई की और फ़िर बडोदा कला भवन में मूर्तिशिल्प, इंजीनियरिंग ड्राइंग, पेंटिंग और फोटोग्राफी सीखी। बतौर फोटोग्राफर कुछ वक़्त गोधरा में बिताया, फिर आर्केओलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के साथ काम किया। फ़िर प्रिटिंग का काम किया। इसी समय उन्होंने कुछ समय एक जर्मन जादूगर के साथ बतौर मेकप-मैन काम किया। उसके बाद उन्हें एक आर्ट प्रिंटिंग प्रेस के लिए काम करने का आमंत्रण मिला और इसी सिलसिले में उनका जर्मनी जाना भी हुआ। यही वह समय था जब उन्हें लग रहा था कि संभवतः फ़िल्म बनाना उन्हें आकर्षित कर रहा है। इसके लिए उपकरणों की ज़रूरत थी जो भारत में उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने अपने एक मित्र से मदद ली और इंग्लॅण्ड जाकर ज़रूरी उपकरण खरीदे। वहीं उन्होंने फ़िल्म-निर्माण की तकनीकी जानकारी भी हासिल की। वापस लौटकर उन्होंने "बर्थ ऑफ़ अ प्लांट" और "राजा हरिश्चंद्र" बनाई। उस युग में जब लोग नौटंकी भी छिपकर देखते थे, फिल्म पूर्णतया टैबू थी। इससे दादासाहेब को स्त्री-पात्र करने के लिए कोई महिला नहीं मिली और फिल्म पर पैसा लगाने वाले लोग मिलने में भी उन्हें काफी दिक्कतें हुईं। यहाँ तक कि फिल्म में जो लोग काम कर रहे थे, उन्हें कहा गया था कि वे बाहर लोगों को यह बताएं कि वे हरिश्चंद्र नाम के किसी आदमी के कारखाने में काम करते हैं। फिर फ़िल्म-निर्माण से जुड़े तकनीकी पक्ष थे, जिनकी कोई जानकारी ठीक-ठीक किसी को नहीं थीं। दादासाहेब ने अपने इंग्लॅण्ड प्रवास के दौरान फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू का अध्ययन किया था और ट्रेनिंग भी ली थी। उसी आधार पर उन्होंने अपना फ़िल्म-निर्माण का सफर शुरू किया। तमाम दिक्कतों और वर्जनाओं के बावजूद जब फिल्म रिलीज़ हुई तो कोरोनेशन थियेटर के बाहर फिल्म देखने वालों का ताँता लग गया। जब यह भीड़ दिनोंदिन बढती रही तो दादासाहेब ने फिल्म के चार प्रिंट और तैयार किए। फिल्म सफल हुई और दादासाहेब प्रसिद्ध फिल्मकार हो गए। कुछ समय बाद जिन सेठों के साथ उन्होंने फिल्म-कंपनी शुरू की थी, उनसे कुछ मनमुटाव हुआ और उन्होंने कम्पनी छोड़ दी। शुरू में उन्हें लगा था कि कंपनी के वित्तीय मामलों की देखरेख सेठ कर लेंगे और वे अपनी रचनात्मक उर्जा का सही जगह इस्तेमाल कर सकेंगे। यही सोचकर उन्होंने सेठों के साथ काम शुरू किया था। मगर ऐसा हुआ नहीं। उनके जाने के बाद रचनात्मकता के अभाव में कंपनी की स्थिति ख़राब होने लगी तो सेठों ने उन्हें लौटने का आग्रह किया और उन्होंने फ़िर कंपनी की बागडोर संभल ली।

वे वित्तीय मामलों से इतना भागते थे कि उनकी कंपनी और स्टूडियो की देखरेख और वित्त की जिम्मेदारी बहुत हद तक उनकी पत्नी देखती थीं। संभवतः फ़िल्म-निर्माण के ज़रूरी पहलू, वित्त को एहमियत न दे पाना एक वजह थी कि अपने अन्तिम वर्षों में वे धनहीन जिए और मरे। वैसे भी यह व्यवसाय तब आज की तरह संगठित नहीं था और इसमें आज की अपेक्षा अनिश्चितताएं ज़्यादा थीं। दादासाहेब के लिए फिल्म-निर्माण मात्र व्यवसाय नहीं था। उन्होंने मुश्किल समय में अपनी पत्नी के गहने फिल्म-कार्य चालू रखने के लिए बेचे, गाँव-गाँव बैलगाडी से अपनी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए घूमे। जितना धन वे कमाते थे अक्सर सब का सब आगे की फिल्मों में लगा देते, इस वजह से उनका जीवन हमेशा अनिश्चितताओं से भरा हुआ था। यह संघर्ष अंततः उनपर भारी पड़ने लगा। १९३२ में उनकी आखरी मूकफिल्म "सेतुबंधन" रिलीज़ हुई, मगर तबतक आदेर्शीर इरानी "आलमआरा" ला चुके थे और सवाक फिल्मों का दौर शुरू हो चुका था। दादासाहेब के पास नई तकनीक के प्रयोग के लिए धन नहीं था और टाकीज के जादू के सामने मूक फिल्में पुरानी पड़ चुकी थीं। इसी साल दादासाहेब की फिल्म-कंपनी बंद हो गई। "सेतुबंधन" को दो-एक सालों बाद डब करके दोबारा लॉन्च किया गया। इसके बाद १९३७ में उन्होंने अपनी आखरी फिल्म "गंगाअवतरण" बनाई। तबतक शायद दादासाहेब का चमत्कार मंद हो चला था। यह फिल्म नहीं चली और दादासाहेब हमेशा के लिए नासिक चले गए - उस आभासी और चमत्कारी दुनिया द्वारा भुला दिए जाने के लिए, जिसे उन्होंने जन्म दिया और परिपक्व किया। आज "हौद्चा बंगला", उनका नासिक स्थित स्टूडियो गिराया जा चुका है, मगर उस ओर अब भी एक तख्ती टंगी दिखाई देती है जिसपर "दादासाहेब फाल्के मार्ग" लिखा है। यह तख्ती उस गौरवशाली अतीत में हमारा एकमात्र संधान-सेतु है, जिसके भग्नशेष भी अब शेष नहीं। अरबों के फिल्म उद्योग के पास आज "राजा हरिश्चंद्र" का एक भी प्रिंट न तो उपलब्ध है और न ही किसी को इसकी परवाह है। नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ़ इंडिया के पास भी इस फिल्म की चार में से दो ही रील उपलब्ध हैं।

पुनश्च: खोज करने पर एक वेबसाइट मिली जहाँ शायद पूरी फिल्म उपलब्ध है, मगर फिलहाल मैं यह दावे के साथ नहीं कह सकता।

Tuesday, February 10, 2009

दर्द की नज़्म है खुदा के लिए

उसका कोई दावा नहीं
दुनिया को बदलने का
या बेहतर बनाने का
वह ईश्वर का संदेश लेकर नहीं आया
न ही बनना चाहता है
उसका स्वघोषित दल्ला
उसके प्रयोजन और चिंतन का आकार
उसके मस्तिष्क जितना छोटा है
फ़िर भी उसे यकीन है
धरती पर खींचीं लकीरें मिट जाएंगी
और धर्म-आत्माएं खटखटा सकेंगी
एक-दूसरे का दरवाज़ा


दर्द की नज़्म है "खुदा के लिए" और उम्मीद का टिमटिमाता दीया भी। अगर गौरव हमारा साझा है, इतिहास हमारा साझा है तो दर्द भी हमारे जुदा नहीं हैं और आशा भी हमारी एक ही है। जो रास्ते वर्तमान हमारे लिए खोले बैठा है उसपर बढ़ना हमारी नियति है। उस रास्ते को हम अतीत में बैठकर बंद नहीं कर सकते। सहनशीलता नहीं तो तुम वर्तमान के हक़दार नहीं, उन सुविधाओं के हक़दार नहीं जो वर्तमान तुम्हें दे रहा है। तो लौट जाओ उसी अतीत में जो तुम्हें सुनहरा दिखता है और देखो, कोशिश कर देखो कि क्या तुम वहां रह पाते हो? सम्भव है उस दौर के लोग तुमसे भी ज़्यादा कट्टर हों और यह भी हो सकता है कि वे तुमसे ज़्यादा उदार हों। अगर वे लोग तुम्हारे जैसे नहीं हुए तो क्या करोगे? कैसे रहोगे उस युग में भी? क्या उससे भी पीछे लौट जाओगे या वापस वर्तमान में शरण ले लोगे? वर्तमान में भी क्या करोगे क्योंकि तुम्हारी आस्था तो टूट चुकी होगी और तुम कट्टर बगैर आस्था के जिंदा भी नहीं रह सकतेधर्म तो मरहम था जिसकी तुम्हें लत लग गई है। तुम्हारे ईश्वर के संदेशवाहक और अवतार तो सिर्फ़ तुम्हारे घावों को सहलाने आए थे और तुमने उनके नामों के दवाखाने खोल दिए जहाँ तुम ज़हर का सौदा कर रहे हो।


"खुदा के लिए" आतंकवाद को एक आम पाकिस्तानी के परिपेक्ष्य से देखने का प्रयास है। यह कोशिश इसलिए अहम् है क्योंकि जब दुनिया आतंकवाद के बारे में सोच रही होती है तो उसके केन्द्र में पाकिस्तान और पाकिस्तानी होते हैं। ऐसे पाकिस्तान और पाकिस्तानी-विरोधी माहौल में वहां के बाशिंदों का क्या रवैया है यह बताने के लिए "खुदा के लिए" ज़मीन तैयार करती है। सरसरी तौर पर ग्रे दिखने वाले चरित्र दरअसल ग्रे ही हों ज़रूरी नहीं। दुविधा ग़लत विचारधारा या मात्र एक ग़लत कदम से भी पैदा हो जाती है। घर पर बैठकर हमें आतंकवाद की समस्या पर रोने की सुविधा है और आरोपी ठान लेने की भी सुविधा है। इस ओर कम ही सोचा जाता है कि क्या वे सभी दोषी हैं जिन्हें हम अपराधी करार दे रहे हैं। यह फ़िल्म एक सेतु बनाती है, जो सीमा के उस पार हैं और जो सीमा के इस पार, उनके बीच और यह सेतु दिल्ली या इस्लामाबाद से होकर नहीं जाता इसलिए सीधा-सीधा संवाद की गुंजाइश बनाता है। दुनिया में सभी जगह रेडिकल मानसिकता वाले लोग हैं और सभी जगह उदारवादी। क्या हमारा काम सिर्फ़ यह याद रखना नहीं है कि शत्रु भी अगर उदार है तो संवाद और समाधान दोनों ही सम्भव है? यह फ़िल्म देखकर कम से कम उम्मीद तो जगती है कि उस ओर भी ऐसे लोग बहुतायत में हैं जो आतंकवाद और उससे जुडी तमाम समस्याओं को उन्हीं आखों से देखते हैं जिनसे हम।

Monday, February 2, 2009

स्लमडॉग मिल्येनर - बॉलीवुड का हॉलीवुड संस्करण

स्लमडॉग मिल्येनर पर भारत में खुशी की लहर दौड़ती दिखाई दे रही है। ज़ाहिर है कि ऑस्कर बॉलीवुड के लिए (पढ़ें हिन्दुस्तान के लिए) आज भी सबसे बड़ा सपना है। यह फ़िल्म भारतीय न होकर भी कम से कम भारत को तो दर्शाती है और इसके निर्माण में एक से अधिक भारतीय जुड़े हुए है इसलिए इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता जब अखबार की हेडलाइन होती है, "स्लमडॉग मिल्येनर दस ऑस्कर के लिए नामांकित"। गोल्डन ग्लोब जीतते ही यह फ़िल्म लोगों की नज़रों में चढ़ गई और यह विचार प्रमुख हो गया कि सेमी-भारतीय फ़िल्म को यह खिताब मिला है। न मिलता यह पुरस्कार तो भारत में ही कितने लोग इस फ़िल्म को देखते या नोटिस करते? हद से हद एक औसत बिजनेस करने वाली फ़िल्म? शायद भारत की ओर से ऑस्कर के लिए नामांकित भी न होती। कारण यह कि कम से कम भारतीयों के लिए यह फ़िल्म बॉलीवुड की सामान्य मसाला फ़िल्म से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकती। यह भी तय है कि यदि यही फ़िल्म भारत में बनी होती तो राष्ट्रीय पुरस्कारों तक भी नहीं पहुँच पाती क्योंकि तब यह हमें साधारण बॉलीवुड मसाला फ़िल्म ही लगती। मेरा मानना है कि इस फ़िल्म को ग़लत कारण के लिए तवज्जो दी जा रही है। वह ग़लत कारण यह मान्यता है कि यह फ़िल्म यथार्थवादी है। हाँ निर्देशन, छायांकन, सम्पादन आदि के लिए इस फ़िल्म को रेकाग्नाएज़ किया जाता तो वह अलग मुद्दा होता मगर सवाल फ़िल्म की सिर्फ़ कलात्मक उत्कृष्टता का नहीं है। सवाल है बाहर वालों द्वारा हमें यह बोध कराना कि किस चीज़ क्या कीमत है और उससे भी बड़ा सवाल यह कि फ़िल्म को जो ख्याति मिल रही है उसके मूल में ठीक ठीक क्या वजहें हैं?

भारत के नाम पर पश्चिम में क्या बिकता है? सांप, बिच्छु, भभूत मले हुए साधू और सड़कों पर घूमती गाय और हाथी। माने एग्जोटिक इंडिया। भारत के बारे में यही संदेश फिल्में, किताबें, ट्रेवालोग आदि भी सालों से पश्चिम के सामने परोस रहे हैं। इस सूची में अब एक चीज़ और जुड़ गई है - कॉल सेंटर। जब स्पीलबर्ग जैसा दिग्गज भारत के बारे में इंडियाना जोन्स जैसी बेतुकी फिल्म बना सकता है तो एक आम पश्चिमी से भारत के बारे में पूरा सच जानने की अपेक्षा करना बेमानी लगता है और दरअसल सच जानना कौन चाहता है? फ़िल्म की कला में व्यापारगत मजबूरियों का तर्क तो हर फ़िल्म बनाने वाला देता ही है तो यही तर्क स्पीलबर्ग के लिए भी फिट बैठता है और डैनी बोयल के लिए भी। मगर यह जानते हुए कि फ़िल्म इतना सशक्त माध्यम है क्या फ़िल्म बनाने वाले की ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि मनोरंजन और सत्य को अलग-अलग रखे? आज अगर कोई अमेरिकी या अँगरेज़ भारत के बारे में अपनी सीमित जानकारी में सांप -बिच्छू के अलावा स्लम और जोड़ देता है तो भारत की तस्वीर में कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा। जो तस्वीर पहले से ही ख़राब है उसपर एक और धब्बे से क्या फर्क पड़ जाएगा?

आज से तकरीबन ७-८ साल पहले जर्मन लोगों से बात करते हुए अक्सर एक ही तरह के सवाल मुझसे पूछे जाते थे। "क्या इंडिया में सचमुच हाथी-गाय सडकों पर घूमते हैं?", "क्या तुम लोग सड़कों पर सोते हो?", "तुम्हें पता है टीवी क्या होता है?", सबसे मजेदार सवाल तो अक्सर कंप्यूटर के बारे में होता था। कई लोग चैट पर पूछते थे, "क्या तुम्हारे यहाँ कंप्यूटर होते हैं?" मेरा जवाब होता था कि हमारे यहाँ कंप्यूटर तो नहीं होते मगर हमने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है कि हम बगैर कंप्यूटर के भी चैट कर लेते हैं। जाहिर है ऐसे बेवकूफाना सवाल पर मैं सिर्फ़ खीझ सकता था। मुझे यह बेहद भयावह स्थिति लगती थी और मैं भारत के बारे में लोगों के अज्ञान को दूर करने में अपने को असहाय पाता था मगर भारत पिछले कुछ सालों से विश्व के नक्शे पर अपनी छवि बदलने में कुछ हद तक कामयाब रहा है। फिर भी पूरा सच यह है कि यह पर्याप्त नहीं है। स्लमडॉग जैसी फिल्में आज भी बन रही हैं जहाँ सच को अयथार्थवादी मुलम्मा चढाकर बाज़ार की ज़रूरतों के हिसाब से सेट किया जाता है और तकनीकी खूबसूरती के साथ परोसा जाता है।

तकरीबन दस साल पहले जर्मनी में भारतीय कंप्यूटर इंजिनीयर्स के विरोध में एक लहर चली थी, जिसे आप छोटा-मोटा मूवमेंट भी मान सकते हैं। सन दो हज़ार में जर्मनी ने पहली बार भारतीय कंप्यूटर इंजिनीयर्स के लिए वर्क-वीसा जारी किए थे। जर्मन लोगों के लिए यह ज़बरदस्त आघात था। एक तो वहां वैसे ही सबसे ज़्यादा बेरोजगार हैं और फ़िर वे जो मानते आ रहे थे कि भारतीय सड़कों पर सोते हैं उनकी नौकरियां वही भारतीय छीन रहे थे। इस मूवमेंट में एक नारा चला था, "किन्डर श्टाट् इन्डर" अर्थात् "भारतीयों के बजाय बच्चे"। वे अपने कंप्यूटर इंजिनीयर्स के अल्पज्ञान से खुश थे मगर भारतीयों को वहां काम नहीं करने देना चाहते थे। यह उनकी नौकरी पर हमला भर नहीं था। बड़ी तादाद में भारतीय वहां अस्पतालों में बतौर नर्स काम करने सत्तर के दशक में भी गए थे। तब किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई। मगर इस बार तकनीक में विश्वभर में सर्वश्रेष्ठ जर्मनी को एक नई तकनीक के लिए तीसरी दुनिया की ज़रूरत पड़ रही थी। दरअसल यह उनके आत्म-सम्मान पर ठोकर थी कि एक गरीब देश के इंजिनीयर्स उनको आकर कंप्यूटर सिखायेंगे। इसकी तह में पश्चिम का वही सदियों पुराना झूठा सर्वश्रेष्ठ होने का भाव था।

उनका भारत के बारे में ज्ञान आज से पचास साल पीछे चल रहा था। मगर इसमे ग़लती किसकी है? जो भी स्रोत उन्हें उपलब्ध हैं वे सब भारत के बारे में शेर-चीते, महाराजा, सौंप-बिच्छू, साधू-संन्यासी और भिखारी ही दिखाते हैं। हमने उन्हें इससे ज़्यादा जानने के लिए नहीं उकसाया इसलिए आज भी वही हो रहा है। दरियागंज के फुटपाथ पर देखिये या लैंडमार्क में, भारत के बारे में जो ट्रेवलॉग छपते हैं उनमे आज भी गंगा के किनारे साधू-सन्यासी ही दिखाए जाते हैं। IISc की कहीं चर्चा नहीं होती। यही खुशफहम रवैया फ़िल्म बनाने वालों ने भी अपनाया हुआ है। एक बार राज्य-सभा में किसी ऐसी भारतीय फ़िल्म पर विवाद उठा जिसमे भारत की गरीबी दर्शायी गई थी। उस समय राज्यसभा सदस्य अभिनेत्री नर्गिस ने यह सवाल उठाया की ऐसी फ़िल्म किसी भी विदेशी समारोह में नहीं भेजी जानी चाहिए क्योंकि इससे भारत की ग़लत छवि दूसरे देशों तक पहुँचेगी। यह तर्क पूरी तरह सही नहीं था मगर पूरी तरह ग़लत भी नहीं था। उनके जवाब में किसी दूसरे सदस्य ने सवाल उठाया कि ऑस्कर के लिए भारत से पहली फ़िल्म मदर इंडिया में भी भारत की गरीबी ही दर्शायी गई थी। इस फ़िल्म में नर्गिस ने काम किया था लिहाजा उनके पास इसका कोई उत्तर नहीं था। उस सदस्य की बात भी पूरी तरह ग़लत नहीं थी।



सवाल यह है कि फ़िल्म जोकि एक कला-माध्यम है उसके लिए क्या इस तरह के सवाल उठाये जाने चाहिए कि उसमें भारत के स्लम दिखाए जा रहे हैं? भारत में स्लम हैं तो उन्हें छिपाने की क्या ज़रूरत? कला अपने आसपास से ही तो जीवन पाती हैं। उसी माहोल से तो सींची जाती है जिसमें वह उठकर खड़ी हुई है। उसमें अच्छा-बुरा सब दिखता है मगर मेरी तकलीफ यहाँ नहीं है। SM से पहले भी ऐसी फिल्में बनती रही हैं जो सचमुच का भारत बगैर किसी लाग-लपेट के, बिना तकनीकी तामझाम के, कैमरे की सपाट आंखों से दिखाती हैं। मेरी नज़र में SM वैसे भी हमारे देश और समाज का रत्ती भर भी सही चित्रण नहीं करती। दूसरी ओर सलाम बॉम्बे इसका जीता-जागता उदाहरण है जोकि ऑस्कर के लिए भी गई थी। मदर इंडिया की बात हम पहले ही कर चुके हैं। अपु-त्रिवेणी को कोई कैसे भूल सकता है, खासकर पथेर-पांचाली को? जहाँ "मेरे अपने" आजादी के बाद पहली निराश पीढ़ी को दिखा रही थी वहीं "सलीम लंगड़े पे मत रो" १८ साल बाद अगली पीढी के साथ उस वक्तव्य को पूरा करती है जिसे गुलज़ार ने अधूरा छोड़ दिया था और "सद्गति" जैसी अद्भुत फ़िल्म का नाम न लेना सही नहीं होगा। क्या इन फिल्मों ने अपने दौर के समाज की नब्ज़ नहीं पकड़ी थी? अवश्य पकड़ी थी मगर इनमे से किसी फ़िल्म को डेविड बोयल ने या स्पीलबर्ग ने नहीं बनाया था इसलिए भारत में किसी को इन्हें एहमियत देना ज़रूरी नहीं लगा।
(सलाम बॉम्बे का एक दृश्य)
दुनिया में सबसे ज़्यादा फिल्में बनने वाले हमारे देश के फिल्मकार ऑस्कर का मुँह क्यों ताकते हैं? पहचान के लिए ही न? अपने बाज़ार के विस्तार के लिए यह ज़रूरी भी है मगर होना इसके विपरीत चाहिए था। जितना बड़ा दर्शक वर्ग हमारे पास है उतना किसी और देश के पास शायद नहीं होगा। दूसरी ओर दर्शक वर्ग जैसा भी हो मगर हमारे पास बेहतरीन फिल्मों का पूरा खजाना भी है और कम से कम बीस साल चला parallel movement भी है। अपनी फ़िल्म कला और अपने पुरस्कारों पर हमें और हमारे फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों को इतराने का पूरा हक है। इतने बड़े बाज़ार के साथ यदि हम चाहते तो अपने देशी पुरस्कारों और फ़िल्म-समारोहों को वैश्विक बना सकते थे मगर IFFI का जो हाल है और सरकार और हमारे ख़ुद के फिल्मकारों का जो रवैया है वह तो सभी को मालूम है। हमारी नज़र तो ऑस्कर पर रहती है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने आज से अस्सी साल पहले १९२९ में कहा था, "कला में रूप प्रयुक्त माध्यमों के अनुसार बदल जाते हैं। मैं जानता हूँ कि चलचित्र के बीच से जिस नयी कला के विकसित होने की अपेक्षा हो सकती थी वह अभी उदित नहीं हुई है। राजनीति में हम स्वतंत्रता के लिए सक्रिय हैं, कला में भी हमें वही करना चाहिए। प्रत्येक कला उस दुनिया के भीतर जिसे वह रचती है, अभिव्यक्ति की अपनी स्वतन्त्र शैली प्राप्त करने की कोशिश करती है। अन्यथा स्वंय में आत्मविश्वास की कमी के कारण इसकी आत्माभिव्यक्ति अपस्तरीय रह जाती है। सिनेमा अब तक साहित्य के गुलाम के रूप में काम कर रहा है क्योंकि अभी तक कोई ऐसा रचनाशील प्रतिभासंपन्न व्यक्ति सामने नहीं आया है जो इसे इसकी गुलामी से मुक्त करे। मुक्ति का यह काम आसान नहीं होगा क्योंकि काव्य, चित्रकला या संगीत में साधन महंगे नहीं होते जबकि सिनेमा में व्यक्ति को केवल रचनात्मकता की ही नहीं बल्कि वित्तीय पूंजी की भी जरूरत होती है।"

मैं यहाँ विकास स्वरूप के उपन्यास की बात नहीं कर सकता क्योंकि मैंने उसे पढ़ा ही नहीं है मगर SM के बारे में निश्चित तौर पर बात करते हुए गुरुदेव की वित्तीय पूंजी वाली बात रेखांकित की जा सकती है। गुरुदेव ने जब यह बात कही थी तब "बर्थ ऑफ़ ऐ नेशन" सरीखी फिल्में बन चुकने के बावजूद सिनेमा अपने शैशव काल में ही था और सीमित साधनों के ज़रिये ही काम कर रहा था। धीरे-धीरे स्थितियां बदलीं और आज फ़िल्म-निर्माण संगठित व्यवसाय है जिसमें करोड़ों रूपया लगता है और अरबों का व्यापार होता है। जिस व्यवसाय में इतना पैसा लगे वहां आज के दौर में तकनीक का बेतरह इस्तेमाल किया जाता है। "टर्मिनेटर - द जजमेंट डे" के बाद तकनीकी निर्भरता बहुत हद तक बढ़ गयी है। फ़िल्म में जितना काम आउटडोर होता है उतना ही लैब के अन्दर भी होता है। कई फिल्में तो पूरी की पूरी लैब के अन्दर ही बन जाती हैं। पिछले बीस सालों में तकनीक सिनेमा पर बहुत हावी हो गई है और मुख्यधारा सिनेमा पूरी तरह इसके प्रभाव में आ चुका है। SM भी इससे अछूती नहीं रही। ३५ mm फ़िल्म इस्तेमाल करनी है या SI-2K इससे फ़िल्म की चाक्षुक गुणवत्ता पर बहुत फर्क पड़ना था जोकि अंततः दर्शक को प्रभावित करने में सफल या असफल रहते। तकनीक के अलावा किसी फ़िल्म की सफलता के लिए दूसरा निर्णायक कारण होता है पब्लिसिटी या मार्केटिंग। गजिनी खोजने जाइए बाज़ार में। सब जगह मिलेगी (जब भी उसकी डी वी डी उपलब्ध होगी) मगर कोशिश कीजिये "श्वास" ढूँढने की। मिलना सम्भव नहीं। मैं पिछले कुछ समय से अदूर गोपालकृष्णन की फिल्में ढूंढ रहा हूँ और आजतक असफल रहा हूँ। मगर SM को पब्लिसिटी या मार्केटिंग लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। यह काम गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों ने कर दिया और हम दीवाने हो गए इस फ़िल्म के। पश्चिम में इस फ़िल्म को हाथों हाथ लिया जाता है तो समझ आता है क्योंकि उनके लिए यह (बॉलीवुड की सामान्य मसाला फ़िल्म की तर्ज़ पर बना मेलोड्रामा) द फेमस इंडियन करी सरीखी डेलिकेसी है जिसे कभी कभी शौकिया खाया जाता है। उनके लिए यह प्रयोग अनोखा अवश्य है मगर एक भारतीय होने के कारण मुझे इस फ़िल्म और सरकार राज या फैशन में ख़ास फर्क नज़र नहीं आया। ये तीनों ही फिल्में मनोरंजन के उद्देश्य से बनीं हैं। दूसरी ओर खुदा के लिए, ब्लैक फ्राईडे, अ वेडनेसडे जैसी फिल्में हैं जो इन फिल्मों से विषय और रूप में बेहतर होते हुए भी उस हिस्टीरिया के लिए तरस रही हैं जो SM के लिए दिख रहा है। चाहें तो इस फेहरिस्त में रामचंद पाकिस्तानी का नाम भी जोड़ा जा सकता है हालाँकि फ़िल्म अंत में अपना फोकस खो देती है इसलिए मेरी पसंदीदा फिल्मों की सूची में नहीं आती। इन सब फिल्मों को भी परे सरका दीजिये और एक बार धर्म और SM को बैक टू बैक देखिये। अन्तर स्वयं ही सामने आ जाता है।

अग्रणी फ़िल्म आलोचक रॉबर्ट एबर्ट का फ़िल्म के बारे में वक्तव्य कितना भ्रामक और अधूरे ज्ञान पर आधारित है यह फ़िल्म के बारे में उनके विचार पढने से पता चलता है। वे कहते हैं, "Danny Boyle's Slumdog Millionaire hits the ground running. This is breathless, exciting story, heartbreaking and exhilarating at the same time, about a Mumbai orphan who rises from rags to riches on the strength of his lively intelligence. The film's universal appeal will present the real India to millions of moviegoers for the first time. By the real India, I don't mean an unblinking documentary like Lois Malle's "Calcutta" or the recent "Born Into Brothels". I mean the real India of social levels that seem to be separated by centuries." क्या रॉबर्ट जिस रियल इंडिया की बात कर रहे हैं वह इस फिल्म में दीखता है? भारत में सदियों से जो वर्ग-विभाजन चला आ रहा है वह आर्थिक न होकर जातीय पहले है जोकि इस फ़िल्म में नहीं है। बिन माँ-बाप के स्लम के बच्चे की ज़िन्दगी इतनी खुशहाल नहीं होती और उसकी आशा भी बेहद क्षीण होती है। वह कॉल-सेंटर में अमेरिकी लोगों से बात नहीं करता और न ही आज का समाज उसे इतना ज्ञान उपलब्ध कराता है कि वह कौन बनेगा करोड़पति में बैठकर यह बता सके कि १०० डॉलर के बिल पर फ्रैंकलिन की तस्वीर है या वाशिंगटन की। जिस रियल इंडिया के बदलने का दावा रॉबर्ट करते हैं वह क्या सचमुच उसी तरह बदल रहा है जैसे यह फ़िल्म दिखाती है?

द सियोल टाइम्स के गौतामन भास्करन के अनुसार इस फ़िल्म में कुछ भी भारतीय नहीं है। उन्होंने इस फ़िल्म को "very little substance" और "superficial and insensitive" जैसे विशेषणों से नवाजा है जोकि ठीक-ठीक मेरा मानना भी है।
दूसरी ओर द गार्जियन के पीटर ब्रॉडशा का मानना है, "Despite the extravagant drama and some demonstrations of the savagery meted out to India's street children, this is a cheerfully undemanding and unreflective film with a vision of India that, if not touristy exactly, is certainly an outsider's view; it depends for its full enjoyment on not being taken too seriously." वे आगे इसे overpraised फ़िल्म भी कह देते हैं।
हमारे यहाँ आए दिन ऐसी फिल्में बनती रहती हैं यह मैंने ऊपर कहा था। बीबीसी के सौतिक बिस्वास ठीक यही बात कहते हैं, "Slumdog Millionaire is an imitation of Indian films that have been "routinely ignored". If you are looking for gritty realism set in the badlands of Mumbai, order a DVD of a film called Satya by Ramgopal Bajaj."
सलमान रश्दी से जब न्युयोर्क टाइम्स इस फ़िल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "I am not a very big fan of Slumdog Millionaire. I think it’s visually brilliant. But I have problems with the story line. I find the storyline unconvincing. It just couldn’t happen. I’m not adverse to magic realism but there has to be a level of plausibility, and I felt there were three or four moments in the film where the storyline breached that rule।"

जहाँ फ़िल्म आलोचक, जिनसे इस विधा के ज्ञान की अपेक्षा की जाती है, तक मतभेद रखते हों वहां दर्शक का भ्रमित हो जाना बेहद आसान है। इस फ़िल्म में अगर कुछ कलात्मक तत्व हैं तो उनकी प्रसंशा की जानी चाहिए मगर यह इस बात से निर्धारित नहीं होना चाहिए कि फ़िल्म को ऑस्कर मिला है या फ़िल्मफेयर। मुझे फ़िल्म का छायांकन अच्छा लगा तो मुझे उसकी तारीफ़ या वर्णन करने से कोई गुरेज़ नहीं (हालाँकि वह भी अद्भुत जैसा तो नहीं ही था।) मगर मात्र इसलिए कि फ़िल्म अमेरिका में हिट है और उसे गोल्डन ग्लोब या ऑस्कर मिले हैं वह बड़ी फ़िल्म नहीं हो जाती। एक और सवाल मेरे जेहन में बार बार कौंध रहा है। क्या गुलज़ार ने "जय हो" से बेहतर गाने नहीं लिखे हैं या रहमान ने इससे अच्छा संगीत कभी नहीं दिया? मुझे सौतिक बिस्वास की बात में सार नज़र आता है जब वे बॉलीवुड को "routinely ignored" कहते हैं। अगर सिटिज़न केन को ऑस्कर मिल सकता है तो 19४७ में आई पड़ोसी को पहचान तो मिलनी ही चाहिए। मगर ऐसा अव्वल तो होता नहीं और अगर कहीं हो भी तो तुक्के से ही होता है। शबाना आज़मी ने एक बार कहा था कि भारत में लोगों को फ़िल्म देखने की शिक्षा दी जानी चाहिए। आज मुझे लगता है कि औसत भारतीय फिल्मों का स्तर सुधरने और लोगों को जागरूक दर्शक बनाने के लिए यह सही सुझाव है।